महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि

यह त्योहार प्रतिवर्ष फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी को अर्थात अमावस्या से एक दिन पहले वाली रात को मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि को भगवान शंकर रूद्र के रूप में प्रजापिता ब्रह्मा के शरीर से प्रकट हुए थे और इसी महाशिवरात्रि को भगवान शिव तांडव नृत्य करते हुए इस सृष्टि को अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से भष्म कर देंगे | कई स्थानों पर यह भी माना जाता है कि इसी दिन भगवान शिव का विवाह हुआ था | इन सब कारणों से महाशिवरात्रि की रात हिंदू धर्मग्रंथों में अतिमहत्त्वपूर्ण है |महाशिवरात्रि से संबंधित कई पौराणिक कथाएँ भी हैं जो बहुत प्रेरणादाई हैं | ऐसी ही एक कथा में चित्रभानु नामक एक शिकारी का उल्लेख मिलता है | चित्रभानु को महाशिवरात्रि के व्रत का कोई ज्ञान नहीं था | वह जंगल के जानवरों को मारकर अपना जीवन यापन करता था | एक बार महाशिवरात्रि के दिन अनजाने में उसे शिवकथा सुनने मिली | शिवकथा सुनने के बाद वह शिकार की खोज में जंगल गया | वहाँ शिकार का इंतज़ार करते-करते वह अनजाने में बेल के पत्ते तोड़कर घास के ढेर के नीचे ढँके हुए शिवलिंग पर फेंकता जाता | उसके इस कर्म से प्रसन्न होकर भगवान शिव उसका ह्रदय निर्मल बना देते हैं | उसके मन से हिंसा के विचार नष्ट जाते हैं | वह जंगल शिकार करने गया था किंतु एक के बाद एक ४ हिरणों को जीवनदान देता है | उस दिन के बाद से चित्रभानु शिकारी का जीवन छोड़ देता है |

भीष्म और श्री कृष्णा का अंतिम संवाद

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था. युद्धभूमि में यत्र-तत्र योद्धाओं के फटे वस्त्र, मुकुट, टूटे शस्त्र, टूटे रथों के चक्के, छज्जे आदि बिखरे हुए थे और वायुमण्डल में पसरी हुई थी घोर उदासी …. ! गिद्ध , कुत्ते , सियारों की उदास और डरावनी आवाजों के बीच उस निर्जन हो चुकी उस भूमि में द्वापर का सबसे महान योद्धा “देवव्रत” (भीष्म पितामह) शरशय्या पर पड़ा सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहा था — अकेला …. !

तभी उनके कानों में एक परिचित ध्वनि शहद घोलती हुई पहुँची , “प्रणाम पितामह” …. !!

भीष्म के सूख चुके अधरों पर एक मरी हुई मुस्कुराहट तैर उठी , बोले , ” आओ देवकीनंदन …. ! स्वागत है तुम्हारा …. !! मैं बहुत देर से तुम्हारा ही स्मरण कर रहा था” …. !!

कृष्ण बोले, “क्या कहूँ पितामह ! अब तो यह भी नहीं पूछ सकता कि कैसे हैं आप” …. !

भीष्म चुप रहे , कुछ क्षण बाद बोले,” पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव … ? उनका ध्यान रखना , परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रासाद में उन्हें अब सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता है” …. !

कृष्ण चुप रहे …. !

भीष्म ने पुनः कहा , “कुछ पूछूँ केशव …. ? बड़े अच्छे समय से आये हो …. ! सम्भवतः धरा छोड़ने के पूर्व मेरे अनेक भ्रम समाप्त हो जाँय ” …. !!

कृष्ण बोले – कहिये न पितामह ….!

एक बात बताओ प्रभु ! तुम तो ईश्वर हो न …. ?

कृष्ण ने बीच में ही टोका , “नहीं पितामह ! मैं ईश्वर नहीं … मैं तो आपका पौत्र हूँ पितामह … ईश्वर नहीं ….”

भीष्म उस घोर पीड़ा में भी ठठा के हँस पड़े …. ! बोले , ” अपने जीवन का स्वयं कभी आकलन नहीं कर पाया कृष्ण , सो नहीं जानता कि अच्छा रहा या बुरा , पर अब तो इस धरा से जा रहा हूँ कन्हैया , अब तो ठगना छोड़ दे रे …. !! “

कृष्ण जाने क्यों भीष्म के पास सरक आये और उनका हाथ पकड़ कर बोले …. ” कहिये पितामह …. !”

भीष्म बोले , “एक बात बताओ कन्हैया ! इस युद्ध में जो हुआ वो ठीक था क्या …. ?”

“किसकी ओर से पितामह …. ? पांडवों की ओर से …. ?”

” कौरवों के कृत्यों पर चर्चा का तो अब कोई अर्थ ही नहीं कन्हैया ! पर क्या पांडवों की ओर से जो हुआ वो सही था !? आचार्य द्रोण का वध , दुर्योधन की जंघा के नीचे प्रहार , दुःशासन की छाती का चीरा जाना , जयद्रथ के साथ हुआ छल , निहत्थे कर्ण का वध , सब ठीक था क्या …. ? यह सब उचित था क्या …. ?”

“इसका उत्तर मैं कैसे दे सकता हूँ पितामह …. ! इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए जिन्होंने यह किया ….. !! उत्तर दें दुर्योधन का वध करने वाले भीम , उत्तर दें कर्ण और जयद्रथ का वध करने वाले अर्जुन …. !! मैं तो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं पितामह …. !!”

“अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे कृष्ण …. ? अरे विश्व भले कहता रहे कि महाभारत को अर्जुन और भीम ने जीता है , पर मैं जानता हूँ कन्हैया कि यह तुम्हारी और केवल तुम्हारी विजय है …. ! मैं तो उत्तर तुम्ही से पूछूंगा कृष्ण …. !”

“तो सुनिए पितामह …. ! कुछ बुरा नहीं हुआ , कुछ अनैतिक नहीं हुआ …. ! वही हुआ जो हो होना चाहिए …. !”

“यह तुम कह रहे हो केशव …. ? मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है ….? यह छल तो किसी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा, फिर यह उचित कैसे गया ….. ? “

इतिहास से शिक्षा ली जाती है पितामह, पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है …. ! हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है …. !! राम त्रेता युग के नायक थे , मेरे भाग में द्वापर आया था …. ! हम दोनों का निर्णय एक सा नहीं हो सकता पितामह …. !!”

” नहीं समझ पाया कृष्ण ! तनिक समझाओ तो …. !”

” राम और कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है पितामह …. ! राम के युग में खलनायक भी ‘ रावण ‘ जैसा शिवभक्त होता था …. !! तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण जैसे सन्त हुआ करते थे ….. ! तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे …. ! उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था …. !! इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया …. ! किंतु मेरे युग के भाग में में कंस , जरासन्ध , दुर्योधन , दुःशासन , शकुनी , जयद्रथ जैसे घोर पापी आये हैं …. !! उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित है पितामह …. ! पाप का अंत आवश्यक है पितामह , वह चाहे जिस विधि से हो …. !!”

“तो क्या तुम्हारे इन निर्णयों से गलत परम्पराएं नहीं प्रारम्भ होंगी केशव …. ? क्या भविष्य तुम्हारे इन छलों का अनुशरण नहीं करेगा …. ? और यदि करेगा तो क्या यह उचित होगा ….. ??”

” भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह …. ! कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा …. ! वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा …. नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा …. ! जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ सत्य एवं धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह…. ! तब महत्वपूर्ण होती है विजय , केवल विजय …. ! भविष्य को यह सीखना ही होगा पितामह….. !!”

“क्या धर्म का भी नाश हो सकता है केशव ? और यदि धर्म का नाश होना ही है, तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है ?”

“सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है पितामह! ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता ….! केवल मार्ग दर्शन करता है … सब मनुष्य को ही स्वयं करना पड़ता है …. ! आप मुझे भी ईश्वर कहते हैं न …. ! तो बताइए न पितामह , मैंने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या ….. ? सब पांडवों को ही करना पड़ा न …. ? यही प्रकृति का संविधान है …. !
युद्ध के प्रथम दिन यही तो कहा था मैंने अर्जुन से …. ! यही परम सत्य है ….. !!”

भीष्म अब सन्तुष्ट लग रहे थे …. ! उनकी आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगीं थी …. ! उन्होंने कहा – चलो कृष्ण ! यह इस धरा पर अंतिम रात्रि है …. कल सम्भवतः चले जाना हो … अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना कृष्ण …. !”

कृष्ण ने मन मे ही कुछ कहा और भीष्म को प्रणाम कर लौट चले , पर युद्धभूमि के उस डरावने अंधकार में भविष्य को जीवन का सबसे बड़ा सूत्र मिल चुका था…. !

जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ सत्य और धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है ….।।

धर्मों रक्षति रक्षितः

♧ पापा देखो मेंहदी वाली ♧

मुझे मेंहदी लगवानी है!

“पँद्रह साल की ‘छोटी’ बाज़ार में

बैठी मेंहदी वाली को देखते ही

मचल गयी…!!

“कैसे लगाती हो मेंहदी?”

पिता ने सवाल किया…

“एक हाथ के पचास दो के सौ…

  मेंहदी लगाने वाली ने जवाब दिया…

पिता को मालूम नहीं था कि आजकल मेंहदी लगवाना इतना मँहगा होता है.
वह बोला:
“नहीं भई एक हाथ के बीस लो

वरना हमें नहीं लगवानी.”

यह सुनकर ‘छोटी’ ने मुँह फुला लिया…!

“अरे अब चलो भी,

नहीं लगवानी इतनी महँगी मेंहदी”

पिता के माथे पर लकीरें उभर आयीं…!

“अरे लगवाने दो ना साहब…

अभी आपके घर में है तो

आपसे लाड़ भी कर सकती है…!

कल को पराए घर चली गई तो

पता नहीं फिर ऐसे मचल पाएगी या नहीं…?

तब आप भी तरसोगे बिटिया की

फरमाईश पूरी करने को…!!

मेंहदी वाली के शब्द थे तो चुभने

वाले पर उन्हें सुनकर पिता को

अपनी बड़ी बेटी की याद आ गई…!

जिसकी शादी उसने तीन साल पहले

एक खाते-पीते, पढ़े-लिखे परिवार में की थी…!

उन्होंने पहले साल से ही उसे छोटी-छोटी बातों पर सताना शुरू कर दिया था…!

दो साल तक वह मुट्ठी भरभर के

रुपये उनके मुँह में ठूँसता रहा पर…

उनका पेट बढ़ता ही चला गया…!

और अंत में एक दिन सीढ़ियों से

गिरकर बेटी की मौत की खबर

ही मायके पहुँची..!!!

आज वह छटपटाता है

कि उसकी वह बेटी फिर से

उसके पास लौट आये…?

और वह चुन-चुन कर उसकी

सारी अधूरी इच्छाएँ पूरी कर दे…!

पर वह अच्छी तरह जानता है

कि अब यह असंभव है…!

“लगा दूँ बाबूजी…?,

एक हाथ में ही सही’

मेंहदी वाली की आवाज से

पिता की तंद्रा टूटी…!

“हाँ हाँ लगा दो…

एक हाथ में नहीं दोनों हाथों में…

और हाँ, इससे भी अच्छी वाली हो

तो वो लगाना” (पिता ने डबडबायी आँखें पोंछते हुए कहा!)

और ‘छोटी’ को आगे कर दिया…

जब तक बेटी हमारे घर है

उनकी हर इच्छा जरूर पूरी करें,

क्या पता आगे कोई इच्छा

पूरी हो पाए या ना हो पाए?

ये बेटियाँ भी कितनी अजीब होती हैं…!

जब ससुराल में होती हैं

तब मायके जाने को तरसती हैं!
सोचती हैं कि घर जाकर माँ को ये बताऊँगी, पापा से ये माँगूंगी, बहिन से ये कहूँगी, भाई को सबक सिखाऊँगी
और मौज मस्ती करुँगी।

लेकिन

जब सच में मायके जाती हैं तो

एकदम शांत हो जाती हैं

किसी से कुछ भी नहीं बोलतीं…!

बस माँ-बाप, भाई-बहन से गले मिलती हैं, बहुत-बहुत खुश होती हैं,

भूल जाती हैं कुछ पल के लिए पति और ससुराल…

क्योंकि

एक अनोखा प्यार होता है मायके में

एक अजीब कशिश होती है मायके में।

ससुराल में कितना भी प्यार मिले

माँ बाप की एक मुस्कान को

तरसती है ये बेटियाँ…

ससुराल में कितना भी रोएँ…

पर मायके में एक भी आँसू नहीं

बहातीं ये बेटियाँ…!!

क्योंकि

बेटियों का सिर्फ एक ही आँसू

माँ-बाप, भाई-बहन को हिला देता है…रुला देता है…!!

कितनी अजीब होती हैं ये बेटियाँ,

कितनी नटखट होती हैं ये बेटियाँ,

भगवान की अनमोल देन होती हैं ये बेटियाँ।

सिर्फ़ किस्मत वालों के यहाँ ही होती हैं ये बेटियाँ।

हो सके तो

बेटियों को बहुत प्यार दें,

उन्हें कभी भी न रुलाएँ,

क्योंकि ये अनमोल बेटियाँ दो

परिवारों को जोड़ती हैं।

दो रिश्तों को साथ लाती हैं।

अपने प्यार और मुस्कान से।

हम चाहते हैं कि

सभी बेटियाँ खुश रहें हमेशा

भले ही वो मायके में हों या ससुराल में।

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ठंड पडबा लागगी

:Dठंड में खूब लो, खावा रो
मजो:D
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ऊना ऊना ढोकळा,
खाओ भली मोकळा ।

मक्की री रोटी, ऊपरे आका रींगणा,
ये पाछे मेले, आच्छा आच्छा जीमणा

जो वेईरा है, खापला,
खूब खाओ बापला ।

आतरे पातरे वणावो हाजो,
गणो बढ्या लागे, ताजो ताजो ।

रोट्या कटे अड़ी री, बापड़ी,
जदी मलिजा ऊनी ऊनी राबड़ी ।

सूबे सूबे खूब भावे लपटो,
जिने नी मले, वो करे खपटो ।

ऊनी ऊनी थाळी भरी गाट,
खावता खावता आँगळ्या जावो चाट

काजु, वदामा री भरी रेवे जेबा,
कुण खावें मिठाया रा ढेबा ।

भावे जतरी खावो जगळ,
पछे खूब करो दंगळ ।

काचाई चबाई जावो मूळा न गाजर,
छाने छाने खूब खावो घर में मोगर ।

पतळो पतळो मोगरी रो खाटो,
ऊबा ऊबा पिवो, नी पड़े घाटो ।

राजन पैईसा पे ध्यान मती दिजो,
ठंड में खूब खावा रो मजो लिजो ।
होचता होचता यूई परा रेवोला,
ठंड पाछी, गणा दन केड़े आवेला
गणा दन केड़े आवेला । ।

Posted from Keshumali