हरियाणवी कहाणी

एक ब एक बूढ़ा सा माणस अर उसका छोरा दूसरे गाम जाण लागरे थे। सवारी वास्तै एक खच्चर ह था। दोनो खच्चर पै सवार होकै चाल पड़े। रास्ते मैं कुछ लोग देख कै बोल्ले, “रै माड़ा खच्चर अर दो-दो सवारी। हे राम, जानवर की जान की तो कोई कीमत नहीं समझदे लोग।”

बूढ़े नै सोच्चया छोरा थक ज्यागा सो छोरा खच्चर पै बैठ्या दिया, अर आप पैदल हो लिया। रस्तै मै फेर लोग मिले, बोल्ले, “देखो, रै छोरा के मजे तै सवारी लेण लगरया सै अर बूढ़ा बच्यारा मरण नै होरया सै ।”

छोरा शर्म मान तल्ले हो लिया। बूढ़ा खच्चर पै बठ्या दिया। फेर लोग मिले, “बूढ़ा के मजे तै सवारी लेण लगरया सै अर छोरा बच्यारा…….। उम्र खाए बेठ्या सै पर ……!

लोकलाज नै बूढ़ा बी उतर गया। दोनो पैदल चलण लाग गे।

थोड़ी देर मैं फेर लोग मिले, “देखो रै लोग्गो! खच्चर गेल्लों सै अर आप दोन जणे पैदल! “पागल सैं।” कोई बोल्या।

कुछ सोच कै बाप अपणे बेट्टे नै कहण लग्या, ‘बेट्टा तैं अराम तै सवारी कर, बैठ जा!”

‘…पर! बापू!”

बूढ़ा बोल्या, ” रै बेट्टा, अराम तै बेठ जा। भोकण दे दुनियां नै। या दुनिया नी जीण दिया करदी बेशक जिस्तरां मरजी करले या तो बस भौकेंगें।

“इब कै हम दोनों खच्चर नै उठा कै चाल्लैंगे? अर फेर के या जीण दें?’

छोरा बाप की बात, अर दुनिया दोनों नै समझ गया था।

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हरियाणवी कहाणी

कुंतल नै पैहरण का बहोत शौक था। टूमा तैं लगाव तो लुगाइयां नै सदा तैं ए रहा सै। अर उनमैं भी गूठी खास मन भावै, क्यूंके परिणयसूत्र में बंधण की रस्मा की शुरुआत ए गूठी तैं होवे सै। यो ए कारण सै अक गूठी के साथ एक भावनात्मक रिश्ता बण ज्या सै। कुंतल की गैलां भी न्युएं हुआ। ब्याह नै साल भर हो ग्या था फेर भी वा अपनी सगाई आली गूठी सारी हाणां आंगली मैं पहरे रहती। चूल्हा- चौका, खेत-क्यार हर जगह उसनै जाणा होता। गोसे पाथण तैं ले कै भैसां तैं चारा डालण ताहीं बल्कि खेतां मैं तै लयाण ताहीं के सारे काम उसनै करणै पड़ै थे। यो ए कारण था अक उसकी सास ने उसतैं कई बार समझाया भी के छोटी सी गूठी, आंगली तैं कढक़ै कितै पड़ ज्यागी। पर कुंतल सास की बात नै काना पर कै तार देती। बस कदे- कदाए उसनै चून ओसणणां पड़ता तै उतार कै एक ओड़ा नै धर देती और हाथ धोते एं फेर पहर लेती।

एक दिन जब सांझ के टैम सबके रोटी खाये पाछै, कासण मांजकै कुंतल साबुन तैं हाथ धोण लागी, तै उसका काळजा धक तैं रह गया- हाथ तैं गूठी गायब थी। उसनै घर में आडै़-उडै़ खूब टोही पर कितै ना दीखी। गूठी खू जाण के डर तैं उसनै आधी रात ताहीं नींद बी ना आई। तडक़ैं उठते एं डांगरां की खोर में, अर इसी ए दूसरी जगहां पै उसनै गूठी खूब ढूंढ़ी। खेत मैं भी वा न्यून-न्यान निगाहें दौड़ाकै देखती रही पर छोटी सी गूठी ना मिलनी थी सो ना मिली। हाँ उसकी इन चौकन्नी नजरां नै ताड़ कै उसका पति देशराज उसतैं इतना जरुर पूछ बैठा-‘के ढूंढ़ सै कुछ खो गया के?’

‘‘कुछ ना” वा आवाज मैं बोली।

‘‘ना, कुछ तै बात सै जो तू बार-बार कबै न्यून-कबै न्यून देखण लाग ज्या सै”

देशराज की बात सुनकै उसने सारी बात बता देण में ए भलाई समझी अर बोली-‘‘लागै सै मेरी गूठी खूगी”

‘‘गूठी खूगी? कितै काढ़ कै तै ना धर दी? कद तै ना मिल री?”

‘‘मनै तै काल रात नै हाथ धोते हाणा बेरा पाट्या अक मेरी
आंगली मैं गूठी कोन्या।”

‘‘जरुर काल ए लिकड़ी होगी। याद कर काल इसा के के काम करा था जब तनै गूठी तारणी पड़ी हो।”

देशराज की बात सुनकै कुंतल ने दिमाग पै जोर डाला तै याद आया अक उसनै काल तडकैं ए चून ओसणा था…हो ना हो गूठी उड़ै रसोई मैं रहगी हो… पर उसनै तै याद आवै जणू उसने हाथ धोकै अंगूठी पहरी हो, फैर भी गूठी कितै और ना मिलण की गुजांयश देख कै उसकी या धारणा पक्की होती गई अक गूठी जरुर चून ओसणती हाणं रसोई मैं ए रहगी थी। घरां आकै दोनों बीर-मर्दां नै पूरी रसोई छाण मारी, पर गूठी ना मिली। इसे मैं सांझ ताहीं गूठी गुम होण की बात पूरे परिवार तांही पहोंचगी। रसोई तो सारे टैम सास के ए हवाले रह सै। ज्यांतै कुंतल के मन में सासु ए संदिग्ध बण गी। न्यूनै सासु नै भी पूरा छोह आ रया था, अक बार-बार नसीहत दीये पाछे भी बहू नै लापरवाही करकै गूठी खो दी।

ऊपर पै बहू नै ‘घर तैं गूठी गई तै गई कित’ जिसी बात मुंह तह काढ़ के सासु रामदेई के दुखी दिल पै करड़ी चोट मारी, तै रामदेई नै भी पूरी कडुआहट तैं जबाब दिया-‘जिसके हाथ तैं जा सकै सै बहू उसके घर तैं जाते के वार लागै सै अर फेर तू तो घर-घेर, गितवाड़ा, खेत क्यार सब जगहां काम करै’। बातां-बातां मैं बात बढ़ती गई। सास बहू के इस वाद-विवाद में बेटे नै पहल्यां माँ का पक्ष लिया पर धीरे-धीरे उसकी बदलती आस्था नै बहू का पलड़ा भारी कर दिया। बड़ी बहू बापणे पीहर गई थी और छोरियां आपणै- आपणै सासरै। रामचंद मूक बणा तमाशा देखता रहा पर उसके मन में भी या बात घर कर गी अक गूठी घर तैं, वो भी रसोई क्वहां तैं, बाहर का कूण उठा सकै सै?

उसनै भी रामदेई पै थोड़ा-थोड़ा शक होण लाग ग्या, हालांकि चालीस बरस के साथ मै उसनै रामदेई की नीयत पै कदे भी शक करण का मौका नहीं मिल्या था। फेर रामदेई धोरै टूमा की बी कोए कमी ना थीं, बल्के उसनै तो छोरयां के ब्याहां मैं आपणी टूमा मैं तै ऐं दोनूं बहुआं की टूम खुद कहकै बणवाई थी, अर इब बी कुछ टूम रामदेई धोरै बच री सैं जिनका बहू बेटियां मैं बंटवारे के सिवाय कोई दूसरा उपयोग उसकी खातर ना बचा था।

कहासुनी तै हो ए रही थी, चाणचक देशराज सीधम-सीध बूझ बैठा ‘माँ, जै तने कितै न्यून-नान धर दी हो तो इब बी बता दे…कोई बात ना…भूल-चूक हो ज्याआ करै सै।’ बेटे की मंशा भांप बूढ़ी रामदेई के तन-बदन में आग लाग गी-‘मेरे तैं के पूछै सै। वा जाणे उसतैं पूछ जिसके हाथ में थी।’

‘‘’मैं ना भूलती तै तू के ठा सकै थी? गलती तै मेरी ऐ सै, पर मन्नै के बेरा था, घर तैं ए चीज न्यूं गायब हो ज्यागी।’ बहू ने रोंतड़ी आवाज मैं घूंघट मैं कै तीर चलाया अर सुबकाण लागी। बात इतणी बढग़ी अक बेटे-बहू की तैं आंगली ए उठी थी, रामचंद का तै हाथ भी उठ गया। रामदेई जड़ होगी।

एक गूठी के पाछे सास-बहू, माँ-बेटा, बीर-मर्द के रिश्ते अपणी मर्यादा खो बैठे थे। रामदेई खातर या घटना, घटना नहीं, बहुत बड़ा हादसा थी। बेटा तो बहू के आते ए पराया हो ज्या सै, पर आडै तै अपना मर्द भी कलंकित करण लाग रहा था। उस दिन पाछै रामदेई ने बस मौन साध लिया। बहू बेटे की बात का तै वा छोटामोटा जवाब दे बी देती, पर रामचंद तैं तैं, उसने कती बोलचाल बंद कर दी।

बड़ी बहू के पीहर तैं आतें एं उसनै बड़े बेटे तैं कह कै दोनूं भाइयों को न्यारा करवा दिया। रामदेई बड़े के साथ अर रामचंद छोटे के साथ रहण लाग ग्या। बेरा ना कड़ै, कितनी दूर बसे दो खानदानों को, दो दिलों को जोडऩे वाली गूठी ने पति-पत्नी तक का बंटवारा करा दिया था।

रामदेई उसूलां की पक्की, काण कायदे आळी औरत थी। वा गळी में भी कदे घूंघट खोल कै ना लिकड़ी, बलके वा तो खाली चपाड़ आगे कै भी घूंघट काढ़ कै चाल्या करती। पूरे गाम मैं उसका मान-सम्मान था। या बात और थी अक उम्र के आखरी दौर में उसके अपणा ने ए उस तैं धोखा दिया तै वा टूट बिखरगी। बेटां की रूखाई, बदसलूकी लुगाई, सह भी ले पर अपणा मर्द ए इसा करै तै वा बेचारी किसनै दोष दे? फेर बहू तै पराया खून ठहरी।

इस हादसे के बाद, डेढ़ साल में ए रामदेई दुनिया नै अलविदा कहगी। रामचंद के दु:ख का कोए ठिकाणा ना था। वो खुद नै हालात तैं मजबूर अर ठगा सा महसूस कर रहा था, और सारा दिन बैठक में एकला बैठा हुक्का गुडग़ुड़ाए जाता।

रामदेई चाहे उसतैं बौलै ना थी, पर वो जब जी करता, बड़े बेटे के घरां जाकै उसके हाथ की बणी चाय पीकै ए राजी हो लेता क्योंकि रामदेई का होणा ए उसकी खातर बड़ा सहारा था। ईब जब रामदेई भगवान नै प्यारी हो गी तै रामचंद की भी जीण की इच्छा लगभग खत्म हो गी थी। पर चाहणे से तो ना मौत मिल्यै, ना जिन्दगी। इन्है विचारा मैं होक्का कब ठंडा हो ग्या, बेरा ए ना पाट्या। रामचंद नै फेर तलब हुई तै वो चिलम उठाकै टूटे से पायां, होक्का भरण चाल पडय़ा। हारे कै धोरै बैठ कै उसनै चिलम की राख झाड़ कै तकबाकू जमाया, अर आग धरण खातर अंगारा तोडऩ लाग्या, तै उसनै लाग्या जणूं चिमटी किसे धातु तैं टकराई हो। उसने फेर चिमटी मारी तो फेर वाए आवाज आई। इस पै रामचंद ने अंगारा, चिमटी तैं तोड़-तो कै बिखरा दिया, तै उसके सामी टूटे अंगारे के टुकड़ां के बीच एक गूठी पड़ी थी, वाए गूठी जो उसनै देशराज की बहू अपनाण खातर सुनार तैं बणवाई थी। जो गोसे पाथती हाणा कुंतल की आंगळी तै लिकडग़ी थी।

खुबसूरत एवं सोच

एक बार एक कुत्ते और गधे के बीच शर्त लगी कि जो जल्दी से जल्दी दौडते हुए दो गाँव आगे रखे एक सिंहासन पर बैठेगा…
वही उस सिंहासन का अधिकारी माना जायेगा, और राज करेगा.

जैसा कि निश्चित हुआ था, दौड शुरू हुई.

कुत्ते को पूरा विश्वास था कि मैं ही जीतूंगा.

क्योंकि ज़ाहिर है इस गधे से तो मैं तेज ही दौडूंगा.

पर अागे किस्मत में क्या लिखा है … ये कुत्ते को मालूम ही नही था.

शर्त शुरू हुई .

कुत्ता तेजी से दौडने लगा.

पर थोडा ही आगे गया न गया था कि अगली गली के कुत्तों ने उसे लपकना ,नोंचना ,भौंकना शुरू किया.

और ऐसा हर गली, हर चौराहे पर होता रहा..

जैसे तैसे कुत्ता हांफते हांफते सिंहासन के पास पहुंचा..

तो देखता क्या है कि गधा पहले ही से सिंहासन पर विराजमान है.

तो क्या…!  
   गधा उसके पहले ही वहां पंहुच चुका था… ?

और शर्त जीत कर वह राजा बन चुका था.. !

और ये देखकर

निराश हो चुका कुत्ता बोल पडा..

अगर मेरे ही लोगों ने मुझे आज पीछे न खींचा होता तो आज ये गधा इस सिंहासन पर न बैठा होता …

तात्पर्य …

१. अपने लोगों को काॅन्फिडेंस में लो.

२. अपनों को आगे बढने का मौका दो,  उन्हें मदद करो.

३. नही तो कल बाहरी गधे हम पर राज करने लगेंगे.

४. पक्का विचार और आत्म परीक्षण करो.

⭐जो मित्र आगे रहकर होटल के बिल का पेमेंट करतें हैं, वो उनके पास खूब पैसा है इसलिये नही … ⭐

⭐बल्कि इसलिये.. कि उन्हें मित्र  पैसों से अधिक प्रिय हैं ⭐

⭐ऐसा नही है कि जो हर काम में आगे रहतें हैं वे मूर्ख होते हैं, बल्कि उन्हें अपनी जवाबदारी का एहसास हरदम बना रहता है इसलिये  ⭐

⭐जो लडाई हो चुकने पर पहले क्षमा मांग लेतें हैं, वो इसलिये नही, कि वे गलत थे… बल्कि उन्हें अपने लोगों की परवाह होती है इसलिये.⭐

⭐जो तुम्हे मदद करने के लिये आगे आतें हैं वो तुम्हारा उनपर कोई कर्ज बाकी है इसलिये नही… बल्कि वे तुम्हें अपना मानतें हैं इसलिये⭐

⭐जो खूब वाट्स एप पोस्ट भेजते रहतें हैं वो इसलिये नही कि वे निरे फुरसती होतें हैं …
बल्कि उनमें सतत आपके संपर्क में बनें रहने की इच्छा रहती है … इसलिये ⭐

हमारा कर्तव्य

यूरोपियन एयरलाइन में एक प्रेमी
नौजवान फर्स्ट क्लास सेक्शन में सफ़र कर
रहा था !
एयर होस्टेस उसके पास आई और उसने
complimentary ड्रिंक ऑफर किया
लेकिन चूँकि वो एल्केहोल ड्रिंक था
प्रेमी
नौजवान ने लेने से मना कर दिया
एयर होस्टेस लौट गयी लेकिन वो वापस
आई नया ड्रिंक लेकर कुछ अलग अंदाज़ से की
ड्रिंक ज्यादा अच्छा नज़र आये
लेकिन
प्रेमी नौजवान ने विनम्रता से मना कर
दिया और बोला की वो एल्कोहोल नही
लेता ..
एयर होस्टेस को बड़ा अजीब लगा और वो
मेनेजर के पास गयी मेनेजर ने एक ड्रिंक
तैयार किया और उसे फूलों से सजा कर
प्रेमी नौजवान के सामने पेश किया और
बोली की हमारी सर्विस में आपको कोई
कमी लगती हे कि जिस वजह से आप ड्रिंक
नही ले रहे ये एक complimentary ऑफर
हे
नौजवान ने जवाब दिया मै सतगुरू का
प्रेमी हूँ तो में एल्कोहोल को छूता भी नही पीना तो बहुत दूर की बात हे …
मेनेजर ने इसे अपना प्रेस्टीज पॉइंट बना
लिया और ड्रिंक लेने की जिद करने लगा
तब प्रेमी नौजवान ने कहा की तुम पहले
पायलट को पिलाओ फिर में पियूँगा
..मेनेजर बोला की पायलट कैसे पी सकता
हे ?
वो ओन ड्यूटी हे और अगर उसने पी लिया
तो पूरे चांसेस हे की प्लेन क्रेश हो
जाएगा…
प्रेमी नौजवान की आँखे नम हो गयी ,वो
बोला मैं भी हमेशा ड्यूटी पर हूँ
और मेरी डयूटी है कि मुझे अपने गुरु जी के वचनो की पालना करनी है
जैसे कि
तुम्हारे पायलट को हर हाल में विमान
बचाना है
उसी तरह से मुझे मेरा ईमान
बचाना हे ..
ईमान बचाना और जिंदगी संवारनी हे …

॥हनुमान चालिसा ॥

श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधार |
बरनौ रघुवर बिमल जसु , जो दायक फल चारि |

बुद्धिहीन तनु जानि के , सुमिरौ पवन कुमार |
बल बुद्धि विद्या देहु मोहि हरहु कलेश विकार ||

।।चौपाई।।

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिंहु लोक उजागर |
रामदूत अतुलित बल धामा अंजनि पुत्र पवन सुत नामा ||2||

महाबीर बिक्रम बजरंगी कुमति निवार सुमति के संगी |
कंचन बरन बिराज सुबेसा, कान्हन कुण्डल कुंचित केसा ||4|

हाथ ब्रज औ ध्वजा विराजे कान्धे मूंज जनेऊ साजे |
शंकर सुवन केसरी नन्दन तेज प्रताप महा जग बन्दन ||6|

विद्यावान गुनी अति चातुर राम काज करिबे को आतुर |
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया रामलखन सीता मन बसिया ||8||

सूक्ष्म रूप धरि सियंहि दिखावा बिकट रूप धरि लंक जरावा |
भीम रूप धरि असुर संहारे रामचन्द्र के काज सवारे ||10||

लाये सजीवन लखन जियाये श्री रघुबीर हरषि उर लाये |
रघुपति कीन्हि बहुत बड़ाई तुम मम प्रिय भरत सम भाई ||12||

सहस बदन तुम्हरो जस गावें अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावें |
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा नारद सारद सहित अहीसा ||14||

जम कुबेर दिगपाल कहाँ ते कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते |
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा राम मिलाय राज पद दीन्हा ||16||

तुम्हरो मन्त्र विभीषन माना लंकेश्वर भये सब जग जाना |
जुग सहस्र जोजन पर भानु लील्यो ताहि मधुर फल जानु ||18|

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख मांहि जलधि लाँघ गये अचरज नाहिं |
दुर्गम काज जगत के जेते सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ||20||

राम दुवारे तुम रखवारे होत न आज्ञा बिनु पैसारे |
सब सुख लहे तुम्हारी सरना तुम रक्षक काहें को डरना ||22||

आपन तेज सम्हारो आपे तीनों लोक हाँक ते काँपे |
भूत पिशाच निकट नहीं आवें महाबीर जब नाम सुनावें ||24||

नासे रोग हरे सब पीरा जपत निरंतर हनुमत बीरा |
संकट ते हनुमान छुड़ावें मन क्रम बचन ध्यान जो लावें ||26||

सब पर राम तपस्वी राजा तिनके काज सकल तुम साजा |
और मनोरथ जो कोई लावे सोई अमित जीवन फल पावे ||28||

चारों जुग परताप तुम्हारा है परसिद्ध जगत उजियारा |
साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे ||30||

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन्ह जानकी माता
राम रसायन तुम्हरे पासा सदा रहो रघुपति के दासा ||32||

तुम्हरे भजन राम को पावें जनम जनम के दुख बिसरावें |
अन्त काल रघुबर पुर जाई जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ||34||

और देवता चित्त न धरई हनुमत सेई सर्व सुख करई |
संकट कटे मिटे सब पीरा जपत निरन्तर हनुमत बलबीरा ||36||

जय जय जय हनुमान गोसाईं कृपा करो गुरुदेव की नाईं |
जो सत बार पाठ कर कोई छूटई बन्दि महासुख होई ||38||

जो यह पाठ पढे हनुमान चालीसा होय सिद्धि साखी गौरीसा |
तुलसीदास सदा हरि चेरा कीजै नाथ हृदय मँह डेरा ||40||

।।दोहा।।
पवन तनय संकट हरन मंगल मूरति रूप |
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ||

बच्चों में अच्छे संस्कार का बीज रोपण

बच्चो में अच्छे संस्कार 16 वर्ष की आयु तक ही डाले जा सकते है। बचपन से ही बच्चो में जो संस्कार माता पिता के द्वारा दिये जाते है, वे ही आगे जाकर उनके भावी जीवन की उन्नती अथवा अवनीति के कारण बनते है।

हमारे बड़े-बुजुर्ग, संत-महात्मा कहते है की जैसा बीज होगा, वैसा ही वृक्ष होगा, तथा वैसा ही उसका फल होगा।

बचपन से ही अच्छे संस्कारो से संस्कारीत बालक युवावस्था में शुभ कार्यो मेें प्रवृत होकर माता-पिता की प्रतिष्ठा एवं स्वयं के सुख का कारण बनता है।

परंतु यदि बचपन से कुसंगत में रहकर कुसंस्कारो का बीजारोपण यदि बालक के जीवन में हो गया तो अपने माता-पिता के साथ ही वह स्वयं अपमानित जीवन जीकर अपने को पतन एवं दुःख की आग में झोक देगा।

श्रीमद्भागवत कथा में गौकर्ण और धुंनकारी की कथा आती है जिसके अनुसार गौकर्ण बचपन से अच्छे संस्कारो में पला था जिसके फलस्वरूप उसमें अपने उद्धार के साथ ही दूसरो की मुक्ती का मार्ग प्रशस्त किया जबकि धुंधुकारी बचपन से ही कुसंगत के कारण अधोगति को प्राप्त हुआ जिसका उद्धार भी गौकर्ण ने किया।

हमारी प्राचीन शिक्षा अधिक मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर निर्भर थी। बच्चों को गुरु, माता-पिता, बड़े व्यक्तियों, धर्म, धार्मिक कार्यों में रुचि उत्पन्न की जाती थी। उनके प्रति पूजनीय भाव प्रारम्भ से ही जोड़ दिये जाते थे, धार्मिक अंत:वृत्ति होने से बड़ा होने पर भी भारतीय भोगवाद की ओर प्रवृत्त न होते थे।

ब्रह्मचर्य का संयम सदैव उन्हें संयमित किया करते थे, पवित्र भाेजन, पवित्र भजन, पूजा, यज्ञ, चिंतन, अध्ययन, मनन आदि से जो गुप्त मन निर्मित होता था, वह ….. पवित्रतम भावनाओं का प्रतीक होता था।

घर का वातावरण भी उच्च नैतिकता से परिपूर्ण होता था, जिससे एक पीढ़ी के पश्चात् दूसरी पीढ़ी उन्हीं संस्कारों को निरन्तर विकसित करती चली आती थी।

जब हमारी भावनाओं में नैतिकता, श्रेष्ठता, पवित्रता का बीज नहीं डाला जायगा, तो किस प्रकार उत्तम चरित्र वाले मानव तथा समाज की या देश की सृष्टि हो सकती है?

आवश्यकता इस बात की है कि पहले माता-पिता स्वयं भावनाओं की शिक्षा की उपयोगिता समझें; स्वयं आदर की भावनाओं को संस्कार रूप में शिशु मन पर स्थापित करें।

वातावरण का भारी महत्व है, वातावरण का अर्थ व्यापक है। घर, तथा संगति तो यह महत्वपूर्ण है हीं, घर की पुस्तकें, दीवारों के चित्र, हमारे गाने, भजन, इत्यादि भी बड़े महत्व के हैं। यदि इन्हीं से उन्नति तथा सुधार की भावना में चलाई जायँ, तो आचार व्यवहार के क्षेत्र में क्रान्ति हो सकती है।

अच्छे-अच्छे भजन, पवित्र कर्त्तव्य की शिक्षा देने वाली कहानियाँ, उत्तमोत्तम व्यवहार द्वारा नये राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण हो सकता है।

बचपन से ही शिशु के मन पर बड़ों के प्रति आदर प्रतिष्ठा सम्मान, छोटों के प्रति स्नेह, दया, सहानुभूति, सहकारिता, बराबर वालों से मैत्री, प्रेम, संगठन सहयोग की भावनाएं बच्चों के गुप्त मन में उत्पन्न करनी चाहिये।

आचरण, आदर्श, तथा उचित निर्देशन से यह कार्य माता-पिता, अध्यापक सभी कर सकते हैं।

Maha Shivaratri

Maha Shivaratri is a Hindu festival celebrated annually in reverence of the God Shiva. It is the day Shiva was married to the GoddessParvati

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‘Maha Shivaratri’ is associated with the marriage of Shiva and Shakti.
Maha Shivaratri also celebrates the night when Lord Shiva performed the ‘Tandava‘, the cosmic dance.

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According to another legend of Samudra manthan, Shiva saved the world from the disastrous effects of a poison that emerged as a by product of the churning of the sea (Samudra manthan), by consuming the whole of the poison. Shiva could arrest the poison in his throat by his Yogic powers and it didn’t go down his throat. His neck turned blue due to the effect of the poison on his throat and henceforth he is also known as Neela Kantha 

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Very early morning, Shiva temples are flocked by devotees, young and old, who come to perform the traditional Shivalinga worship (puja) and hence hope for favours from the God. Devotees bathe at sunrise, preferably in the Ganga, 

समान बल का प्रयोग

गंगा तट पर एक संत अपने शिष्याें काे शिक्षा दे रहे थे, तभी एक शिष्य ने पूछा, “गुरुजी, यदि हम कुछ नया, कुछ अच्छा करना चाहते है, लेकिन समाज उसका विराेध करता है ताे हमे क्या करना चाहिए?

गुरुजी ने कुछ साेचा और बाेले “इस प्रश्न का उत्तर मैं कल दूंगा।”

अगले दिन जब सभी शिष्य नदी के तट पर एकत्रित हुए ताे गुरुजी बाेले, ताे आज हम एक प्रयोग करेंगे….. इन तीन मछली पकड़ने वाली डंडियाें काे देखाे, ये एक ही लकड़ी से बनी हैं और बिल्कुल एक समान हैं।”

उसके बाद गुरुजी ने उस शिष्य काे आगे बुलाया जिसने कल प्रश्न किया था। “पुत्र, ये लाे इस डंडी से मछली पकड़ाे।” ,गुरुजी ने निर्देश दिया। शिष्य ने डंडी से बंधे कांटे मे आंटा लगाया और पानी में डाल दिया। फाैरन ही एक बड़ी मछली कांटे में आ फंसी। जल्दी पूरी ताकत लगाकर बाहर की ओर खींचाे” गुरुजी बाेले।

शिष्य ने ऐसा ही किया, उधर मछली ने भी पूरी ताकत से भागने की काेशिश की। फलतः डंडी टूट गयी। “काेई बात नहीं; ये दूसरी डंडी लाे और पुनः प्रयास कराे।” गुरुजी बाेले। शिष्य ने फिर से मछली पकड़ने के लिए कांटा पानी में डाला।

इस बार जैसे ही मछली फंसी, गुरुजी बाेले, “आराम से एकदम हल्के हाथ से डंडी काे खींचाे।” शिष्य ने ऐसा ही किया, पर मछली ने इतनी ज़ाेर से झटका दिया कि डंडी हाथ से छूट गयी। गुरुजी ने कहा, “ओहहाे लगता है मछली बच निकली, चलाे इस आखिरी डंडी से एक बार फिर से प्रयत्न कराें।”

शिष्य ने फिर वही किया। पर इस बार जैसे ही मछली फंसी गुरुजी बाेले, “सावधान इस बार न अधिक ज़ाेर लगाओ न कम बस जितनी शक्ति से मछली खुद काे अंदर की ओर खींचे उतनी ही शक्ति से तुम डंडी काे बाहर की ओर खींचाे। कुछ ही देर में मछली थक जायेगी और तब तुम आसानी से उसे बाहर निकाल सकते हाे।” शिष्य ने ऐसा ही किया और इस बार मछली पकड़ मेें आ गयी।

“क्या समझे आप लाेग?” शिष्य गुरुजी ने बाेलना शुरु किया….. ये मछलियाँ उस समाज के समान हैं जाे आपके कुछ करने पर विराेध करता है। यदि आप इनके खिलाफ अधिक शक्ति का प्रयाेग करेंगे ताे आप टूट जायेंगे। यदि आप कम शक्ति का प्रयाेग करेंगे ताे भी वे आपकाे या आपकी याेजनाओं काे नष्ट कर देंगे। ….. लेकिन यदि आप उतने ही बल का प्रयाेग करेंगे जितने बल से वे आप का विराेध करते हैं ताे धीरे-धीरे वे थक जायेंगे….. हार मान लेंगे और तब आप जीत जायेंगे।