देवी दुर्गा को संसार की शक्ति का आधार माना गया है। वेदों और पुराणों में देवी दुर्गा का वर्णन देवी भगवती, आदि शक्ति, महागौरी आदि नामों से किया गया है। देवीभागवत में वर्णन किया गया है कि आश्विन मास में मां भगवती की पूजा करने से मनुष्य का कल्याण होता है।

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Navaratri is a festival dedicated to the worship of the Hindu deity Maa Durga. The word Navaratri means ‘nine nights’ in Sanskrit, nava meaning nine and ratri meaning nights.
During these nine nights , nine forms of Devi are worshipped. 
As par jyotish
Navaratri Day 1 Pratipada : Ghatasthapana Shailputri Pujan

Navaratri Day 2 Dwitiya : Chandra Darshan Brahmacharini Pujan

Navaratri Day 3 Tritiya : Sindoor Tritiya Chandraghanta Pujan

Navaratri Day 4 chaturthi : Varad Vinayaka Chauth

Navaratri Day 5 Panchami : Upang Lalita Vrat Skandamata Pujan

Navaratri Day 6 Shashthi : Saraswati Awahan Katyayani Pujan

Navaratri Day 7 Saptami : Saraswati Puja Kalaratri Pujan

Navaratri Day 8 Ashtami : Durga Ashtami Mahagauri Pujan Sandhi Puja, Maha Ashtami

Navaratri Day 9 Navami : Ayudha Puja Durga Visarjan, Maha Navami
Dresses which Devi wear on different days
On Sunday goddess wears red/maroon.
On Monday goddess wears white or cream.
On Tuesday goddess wears orange.
On Wednesday goddess wears green.
On Thursday goddess wears yellow.
On Friday goddess wears silver.
On Saturday goddess wears blue or peacock.

महाभारत युद्ध चल रहा था। अर्जुन के सारथी श्रीकृष्ण थे। जैसे ही अर्जुन का बाण छूटता, कर्ण का रथ कोसों दूर चला जाता। जब कर्ण का बाण छूटता तो अर्जुन का रथ सात कदम पीछे चला जाता। श्रीकृष्ण ने अर्जुन के शौर्य की प्रशंसा के स्थान पर कर्ण के लिए हर बार कहा कि कितना वीर है यह कर्ण? जो उस रथ को सात कदम पीछे धकेल देता है।

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अर्जुन बड़े परेशान हुए। असमंजस की स्थिति में पूछ बैठे कि हे वासुदेव! यह पक्षपात क्यों? मेरे पराक्रम की आप प्रशंसा करते नहीं एवं मात्र सात कदम पीछे धकेल देने वाले कर्ण को बारम्बार वाहवाही देते है।

श्रीकृष्ण बोले-अर्जुन तुम जानते नहीं। तुम्हारे रथ में महावीर हनुमान एवं स्वयं मैं वासुदेव कृष्ण विराजमान् हूँ। यदि हम दोनों न होते तो तुम्हारे रथ का अभी अस्तित्व भी नहीं होता। इस रथ को सात कदम भी पीछे हटा देना कर्ण के महाबली होने का परिचायक हैं। अर्जुन को यह सुनकर अपनी क्षुद्रता पर ग्लानि भी हुई।

इस तथ्य को अर्जुन और भी अच्छी तरह सब समझ पाए जब युद्ध समाप्त हुआ।

प्रत्येक दिन अर्जुन जब युद्ध से लौटते श्रीकृष्ण पहले उतरते, फिर सारथी धर्म के नाते अर्जुन को उतारते। अंतिम दिन वे बोले-“अर्जुन! तुम पहले उतरो रथ से व थोड़ी दूरी तक जाओ।” भगवान के उतरते ही घोड़ा सहित रथ भस्म हो गया। अर्जुन आश्चर्यचकित थे। भगवान बोले-“पार्थ! तुम्हारा रथ तो कभी का भस्म हो चुका था। भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य व कर्ण के दिव्यास्त्रों से यह कभी का नष्ट हो चुका था।मेरे-स्रष्टा के संकल्प ने इसे युद्ध समापन तक जीवित रखा था।”

अपनी विजय पर गर्वोन्नत अर्जुन के लिए गीता श्रवण के बाद इससे बढ़कर और क्या उपदेश हो सकता था कि सब कुछ भगवान का किया हुआ है। वह तो निमित्त मात्र था। काश हमारे अंदर का अर्जुन इसे समझ पायें

सुख सागर

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एकइंसान घने जंगल में भागा जा रहा था। शाम हो चुकी थी इसलिए अंधेरे में उसे कुआं दिखाई नहीं पड़ा और वह उसमें गिर गया।

गिरते-गिरते कुएं पर झुके पेड़ की एक डाल उसके हाथ में आ गई। जब उसने नीचे झांका तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गयी क्यूंकि कुएं में चार अजगर मुंह खोले उसे देख रहे हैं; और जिस डाल को वह पकड़े हुए था, उसे दो चूहे कुतर रहे थे।

इतने में एक हाथी आया और पेड़ को जोर-जोर से हिलाने लगा। आदमी घबरा गया और सोचने लगा कि हे भगवान अब क्या होगा!

उसी पेड़ पर मधुमक्खियों का छत्ता लगा था। हाथी के पेड़ को हिलाने से मधुमक्खियां उडऩे लगीं और शहद की बूंदें टपकने लगीं। एक बूंद उसके होठों पर आ गिरी।

उसने प्यास से सूख रही जीभ को होठों पर फेरा, तो शहद की उस बूंद में गजब की मिठास थी। 

कुछ पल बाद फिर शहद की एक और बूंद उसके मुंह में टपकी। अब वह इतना मगन हो गया कि अपनी मुश्किलों को भूल गया।

तभी उस जंगल से शिवजी एवं पार्वती अपने वाहन से गुजरे। माँ पार्वती ने उसकी दयनीय स्थिति को देखकर भगवान शिव से उसे बचाने का अनुरोध किया।

भगवान शिव ने उसके पास जाकर कहा-“मैं तुम्हें बचाऊंगा, मेरा हाथ पकड़ लो”। उस इंसान ने कहा कि “एक बूंद शहद और चाट लूं, फिर चलता हूं।”

एक बूंद, फिर एक बूंद और हर एक बूंद के बाद अगली बूंद का इंतजार।

आखिर थक-हारकर शिवजी चले गए। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं की उस इंसान का क्या हाल हुआ होगा।  

ठीक ऐसा ही हाल हमारा भी है, आईये इस कहानी को अब अपने सन्दर्भ में देखें।  

वह आदमी जिस जंगल में जा रहा था, वह जंगल है दुनिया और अंधेरा है अज्ञान – पेड़ की डाली है – आयु, जिसे दिन-रात रूपी चूहे कुतर रहे हैं। घमंड का मदमस्त हाथी पेड़ को उखाडऩे में लगा है। शहद की बूंदें सांसारिक सुख हैं, जिनके कारण मनुष्य खतरे को भी अनदेखा कर देता है, और उन खतरों से निकलने वाले रास्तों की ओर  से भी मुंह फेर लेता है।  

अतः सुख की मोह माया में फंसे व्यक्ति को परमात्मा भी नहीं बचा सकते ।            

परख

मिलने की आज्ञां मांगी। प्रवेश मिल गया तो उसने कहा, मेरे पास दो वस्तुएँ हैं, बिलकुल एक जैसी लेकिन एक नकली है और एक असली, मै हर राज्य के राजा के पास जाता हूँ और उन्हें परखने का आग्रह करता हूँ, लेकिन कोई परख नही पाता, सब हार जाते है और मैं विजेता बनकर घूम रहा हूँ । 

अब आपके नगर मे आया हूँ।

राजा ने उसे दोनों वस्तुओं को पेश करने का आदेश दिया।  

तो उसने दोनों वस्तुयें टेबल पर रख दीं।  बिल्कुल समान आकार समान रुप रंग, समान प्रकाश, सब कुछ नख शिख समान। राजा ने कहा, ये दोनों वस्तुएँ एक हैं, तो उस व्यक्ति ने कहा, हाँ दिखाई तो एक सी देती है लेकिन हैं भिन्न। इनमें से एक है बहुत कीमती हीरा और एक है काँच का टुकडा, लेकिन रूप रंग सब एक है। कोई आज तक परख नही पाया कि कौन सा हीरा है और कौन सा काँच? कोई परख कर बताये कि ये हीरा है या काँच। अगर परख खरी निकली तो मैं हार जाऊँगा और यह कीमती हीरा मै आपके राज्य की तिजोरी में जमा करवा दूँगा, यदि कोई न पहचान पाया तो इस हीरे की जो कीमत है उतनी धनराशि आपको मुझे देनी होगी। इसी प्रकार मैं कई राज्यों से जीतता आया हूँ। 

राजा ने कई बार उन दोनों वस्तुओं को गौर से देखकर परखने की कोशिश की और अंत में हार मानते हुए कहा- मैं तो नहीं परख सकूंगा।

दीवान बोले- हम भी हिम्मत नही कर सकते, क्योंकि दोनो बिल्कुल समान है।

सब हारे, कोई हिम्मत नही जुटा पाया। हारने पर पैसे देने पडेंगे, इसका किसी को कोई मलाल नहीं था क्योंकि राजा के पास बहुत धन था लेकिन राजा की प्रतिष्ठा गिर जायेगी, इसका सबको भय था।

कोई व्यक्ति पहचान नही पाया। आखिरकार पीछे थोडी हलचल हुई। एक अंधा आदमी हाथ मे लाठी लेकर उठा। उसने कहा, मुझे महाराज के पास ले चलो, मैंने सब बाते सुनी हैं और यह भी सुना कि कोई परख नहीं पा रहा है। एक अवसर मुझे भी दो। एक आदमी के सहारे वह राजा के पास पहुचा उसने राजा से प्रार्थना की- मैं तो जनम से अंधा हूँ फिर भी मुझे एक अवसर दिया जाये जिससे मैं भी एक बार अपनी बुद्धि को परखूँ और हो सकता है कि सफल भी हो जाऊँ और यदि सफल न भी हुआ तो वैसे भी आप तो हारे ही हैं। 

राजा को लगा कि इसे अवसर देने मे कोई हर्ज नहीं है और राजा ने उसे अनुमति दे दी। उस अंधे आदमी को दोनों वस्तुएं उसके हाथ में दी गयी और पूछा गया कि इनमे कौन सा हीरा है और कौन सा काँच? 

कहते हैं कि उस आदमी ने एक मिनट मे कह दिया कि यह हीरा है और यह काँच। जो आदमी इतने राज्यों को जीतकर आया था वह नतमस्तक हो गया और बोला सही है, आपने पहचान लिया! आप धन्य हैं।

अपने वचन के मुताबिक यह हीरा मैं आपके राज्य की तिजोरी मे दे रहा हूँ। सब बहुत खुश हो गये और जो आदमी आया था वह भी बहुत प्रसन्न हुआ कि कम से कम कोई तो मिला परखने वाला। राजा और अन्य सभी लोगो ने उस अंधे व्यक्ति से एक ही जिज्ञासा जताई कि, ‘तुमने यह कैसे पहचाना कि यह हीरा है और वह काँच?’ 

उस अंधे ने कहा- सीधी सी बात है राजन, धूप में हम सब बैठे हैं, मैंने दोनो को छुआ। जो ठंडा रहा वह हीरा, जो गरम हो गया वह काँच।

यही बात हमारे जीवन में भी लागू होती है, जो व्यक्ति बात बात में अपना आप खो देता है, गरम हो जाता है और छोटी से छोटी समस्याओं में उलझ जाता है वह काँच जैसा है और जो विपरीत परिस्थितियों में भी सुदृढ़ रहता है और बुद्धि से काम लेता है वही सच्चा हीरा है।